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Summary
एक पिता की चिता जल रही थी जब उनकी सबसे बड़ी बेटी वीडियो कॉल पर थी। उन्होंने अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए ऑनलाइन 141 रुपये भेजे और कहा कि वही कर दें।
From the report
एक पिता की चिता जल रही थी उस वक्त उनकी सबसे चोटी बेटी वीडियो कॉल पर जानते हैं क्या पूछे रही थी और कितना टाइम लगेगा सोचिये जिसने पूरी जिन्दगी अपने बच्चों के लिए वक्त निकाला उसके आखरी सफर के लिए भी किसी के पास वक्त नहीं था ये कहानी किसी बेसहरा आदमी की नहीं है ये कहानी मुंबई के बड़े कपड़ा कारोबारी रहे शिव चरण गुपता की है जिन्नोंने जिन्दगी भर मेहनत की कारोबार खड़ा किया तीन बेटीयों को पढ़ाया लिखाया, अच्छे घरों में उनकी शादी की शायद हर पिता की तरह उन्होंने भी यही सोचा होगा कि बुढ़ापे की सबसे बड़ी पूझी बैंक बैलेंस नहीं बलकि अपनी औलाद होती है लेकिन जिन्दगी बैलेंश शीट से नहीं चलती कई बार रिष्टे भी घाटे का सौधा साबित हो जाते हैं कारोबार में नुकसान हुआ, हालात बदले और अपने भी बदल गए मजबूरी ऐसी बनी कि पत्नी के साथ हर्याणा के सोनी पत इस्थिति व्रधाश्रम में आकर रहना पड़ा। दो साल पहले पत्नी का भी वही निधन हो गया। अब उनके पास ना जीवन साथी बचा था, ना अपना घर। पस एक उम्मीद थी कि जिन बच्चों के लिए शायद पूरी जिन्दगी खपाई है, शायद वे आखरी समय में साथ खड़े होंगे। 4 74 इसके बजाए ओनलाइन इक्यावन सो रुपए भेज दिये गया और कहा गया कि अंतिम संसकार वही कर दीजेगा. सोचिये जिस पिता ने पूरी जिंदगी बेटियों के भविष्यों पर खर्चा किया उनकी विदाये का हिसाब किताब आखिरकार ओनलाइन ट्रांसफर से पूरा कर दिया गया आश्रम के लोगों और समास सेवी उन्हें बेटे का फर्ज निभाया उन्होंने अंतिम संसकार करवाया और दूसरी तरफ सबसे चोटी बीटी वीडियो कॉल पर जूडी रही उसने जलती चिता देखी और पूछा अच्छे से हो गया ना वीडियो भेज देना और कितना टाइम लगेगा…
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Summary
एक पिता की चिता जल रही थी जब उनकी सबसे बड़ी बेटी वीडियो कॉल पर थी। उन्होंने अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए ऑनलाइन 141 रुपये भेजे और कहा कि वही कर दें।
“कभी कभी एक वाक्य की पूरी कहानी बयां कर देता है”From the report
एक पिता की चिता जल रही थी उस वक्त उनकी सबसे चोटी बेटी वीडियो कॉल पर जानते हैं क्या पूछे रही थी और कितना टाइम लगेगा सोचिये जिसने पूरी जिन्दगी अपने बच्चों के लिए वक्त निकाला उसके आखरी सफर के लिए भी किसी के पास वक्त नहीं था ये कहानी किसी बेसहरा आदमी की नहीं है ये कहानी मुंबई के बड़े कपड़ा कारोबारी रहे शिव चरण गुपता की है जिन्नोंने जिन्दगी भर मेहनत की कारोबार खड़ा किया तीन बेटीयों को पढ़ाया लिखाया, अच्छे घरों में उनकी शादी की शायद हर पिता की तरह उन्होंने भी यही सोचा होगा कि बुढ़ापे की सबसे बड़ी पूझी बैंक बैलेंस नहीं बलकि अपनी औलाद होती है लेकिन जिन्दगी बैलेंश शीट से नहीं चलती कई बार रिष्टे भी घाटे का सौधा साबित हो जाते हैं कारोबार में नुकसान हुआ, हालात बदले और अपने भी बदल गए मजबूरी ऐसी बनी कि पत्नी के साथ हर्याणा के सोनी पत इस्थिति व्रधाश्रम में आकर रहना पड़ा। दो साल पहले पत्नी का भी वही निधन हो गया। अब उनके पास ना जीवन साथी बचा था, ना अपना घर। पस एक उम्मीद थी कि जिन बच्चों के लिए शायद पूरी जिन्दगी खपाई है, शायद वे आखरी समय में साथ खड़े होंगे। 4 74 इसके बजाए ओनलाइन इक्यावन सो रुपए भेज दिये गया और कहा गया कि अंतिम संसकार वही कर दीजेगा. सोचिये जिस पिता ने पूरी जिंदगी बेटियों के भविष्यों पर खर्चा किया उनकी विदाये का हिसाब किताब आखिरकार ओनलाइन ट्रांसफर से पूरा कर दिया गया आश्रम के लोगों और समास सेवी उन्हें बेटे का फर्ज निभाया उन्होंने अंतिम संसकार करवाया और दूसरी तरफ सबसे चोटी बीटी वीडियो कॉल पर जूडी रही उसने जलती चिता देखी और पूछा अच्छे से हो गया ना वीडियो भेज देना और कितना टाइम लगेगा…
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