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Summary
पिछर देखी थी वास्तब बहुत छोटा था जब से सोच लिया वाही बनना है और रुके नहीं है जब से हर मां के गोदे उचलनी हर रोज यहाँ पर यही यही चलना करते हैं हम चाकू कहां से मिलते हैं?
From the report
पिछर देखी थी वास्तब बहुत छोटा था जब से सोच लिया वाही बनना है और रुके नहीं है जब से हर मां के गोदे उचलनी हर रोज यहाँ पर यही यही चलना करते हैं हम चाकू कहां से मिलते हैं? ओले में बाते हैं ये शोजना कितनी बार चाबू खड़े देते हैं? तीन साथ बार खड़े देते हैं अगर आपको बंदुख चलाने का मौहाल है यहाँ पे तो हर कोई बंदुख चलाने के दिशा पे जाएगा पर जाएगा अब दिल्ली पुलिस में जिसना जमना पार में नौकरी कर ले पूरी दिल्ली में कर लेगा अ नोट इस दिल्ली राजधानी का वह हिस्सा जहां तंग गल्यों और घीरभाड़ के पीछे एक और दुनिया पल रही है मैं पिछले करीब तीन चार महीनों से दिन हो या रात इनी गलियों में घूम रहा हूँ और ऐसा मैं इसलिए कर पा रहा हूँ क्योंकि आप मेरे साथ हैं इसलिए आगे बढ़ने से पहले News Laundry को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिए अब आगे बढ़ते हैं और नौर्थीस दिल्ली के इस पातालोग को समझते हैं
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पिछर देखी थी वास्तब बहुत छोटा था जब से सोच लिया वाही बनना है और रुके नहीं है जब से हर मां के गोदे उचलनी हर रोज यहाँ पर यही यही चलना करते हैं हम चाकू कहां से मिलते हैं?
“हर कोई बंदुख चलाने के दिशा पे जाएगा”From the report
पिछर देखी थी वास्तब बहुत छोटा था जब से सोच लिया वाही बनना है और रुके नहीं है जब से हर मां के गोदे उचलनी हर रोज यहाँ पर यही यही चलना करते हैं हम चाकू कहां से मिलते हैं? ओले में बाते हैं ये शोजना कितनी बार चाबू खड़े देते हैं? तीन साथ बार खड़े देते हैं अगर आपको बंदुख चलाने का मौहाल है यहाँ पे तो हर कोई बंदुख चलाने के दिशा पे जाएगा पर जाएगा अब दिल्ली पुलिस में जिसना जमना पार में नौकरी कर ले पूरी दिल्ली में कर लेगा अ नोट इस दिल्ली राजधानी का वह हिस्सा जहां तंग गल्यों और घीरभाड़ के पीछे एक और दुनिया पल रही है मैं पिछले करीब तीन चार महीनों से दिन हो या रात इनी गलियों में घूम रहा हूँ और ऐसा मैं इसलिए कर पा रहा हूँ क्योंकि आप मेरे साथ हैं इसलिए आगे बढ़ने से पहले News Laundry को जरूर सब्सक्राइब कर लीजिए अब आगे बढ़ते हैं और नौर्थीस दिल्ली के इस पातालोग को समझते हैं
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