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Summary
भारत में हर साल जून से सितंबर के बीच बारिश के कारण कई शहर और गांव डूब जाते हैं। सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, गाड़ियां तैरने लगती हैं और पहाड़ी राज्यों में बारिश फ्लैश फ्लड्स में बदल जाती है।
From the report
कितनी दिलकश हैं ये बारिश की फुहारे लेकिन उर्दू शायर त्रिपुरारी ने ये पंक्तियां बारिश वाली एक शाम को लिखी होगी लेकिन बारिश सब के लिए रोमांटिक नहीं होती शायद इसी वजह से उन्होंने लेकिन लगा कर अगली ही पंक्ती में लिखा था ऐसी बारिश में मेरी जान भी जा सकती है आज के मौनसून वाली बारिश की सबसे बड़ी विडंबना भी कुछ ऐसी ही है एक और किसी पॉश इलाके में लोग चाय पकोड़ों के साथ बारिश को इंजॉय कर रहे होते हैं वहीं देश के किसी कोने में यही बारिश बाड बन कर सो से ज्यादा लोगों की जान ले लेती है असल में हर साल जून से सितंबर के बीच भारत का कोई शेहर या गाउ बारिश में डूबा ही रहता है सडके नदियां बन जाती हैं, गाड़ियां तैरने लगती हैं, यूपी बिहार में पूरे के पूरे गाउ बाड में समाजाते हैं और पहाडी राज्यों में तो कुछ मिनिटों में ही बारिश ही फ्लैश फ्लड्स में बदल जाती है बैठ के बाद के पिछले एपिसोड में हमने गॉडमिन कल्चर यानी स्वयंभू बाबाओं की दुनिया खंगाली थी आज हम इन दिनों के सबसे जरूरी मुद्दे इंडिया's flood crisis पर बात करेंगे drainage system पर बात करेंगे वीडियो में समझेंगे कि आखिर हर साल भारत बारिश के पानी में क्यों डूब जाता है आज focus solution यानी समाधानों पर रहेगा जानेंगे कि चीन, नेदलेंज, सिंगापूर और जापान जैसे देश इस प्रॉबलम से कैसे टैकल करते हैं तो चलिए इंडियाज फ्लड क्राइसिस पर बैठ के बात करते हैं क्योंकि सभी जरूरी मुद्दों और उनके समाधानों पर बैठ के ही बात होती है 7 अगस्त की रात करीब 10 बजे मैं अपने दफ्तर से घर के लिए निकल रही थी देरी से निकलने की वज़ा दिन भर हुई बारिश थी सडकों पर कई किलो मीटर लंबा जाम लगा हुआ था मेरी कैब बोटानिकल गार्डन और नॉइडा सेक्टर 18 के बीच वाले रास्ते में आधी पानी में डूब गई थी पूरे रूट में ज्यादातर जगहों पर पानी भरा हुआ था और कुछ रास्ते तो पूरी तरह बंध हो गए थे कैब ड्राइवर ने जैसे तैसे दूसरा रूट लिया और मुझे घर तक पहुँचाया अगले दिन जब वेदर अपडेट देखा तो पता चला कि 7 अगस्त की सुभा से 8 अगस्त की सुभा तक यानि सिर्फ 24 घंटे में दिल्ली में 98.7 मिली मीटर बारिश हुई अगस्त के महीने में एक दिन में इतनी बारिश आखरी बार 2024 में हुई थी जब 1 अगस्त को दिल्ली में 107.6 मिलिमीटर पानी बरसा था भारत का Meteorological Department यानि IMD बारिश को 4 categories में डिवाइड करता है 2 15 light light rain 15 mm moderate 64 115 heavy और 115.6 से 204.4 मिलीमेटर की बारिश को very heavy category में डाला जाता है, यानि बहुत तेज बारिश अगस्त के शुरुआती आठ दिनों में दिल्ली में कुल 230 मिलिमीटर बारिश हुई ये पिछले 15 सालों में सबसे ज्यादा थी रिकॉर्ड तोड बारिश के दो फायदे हुए राजधानी का एय क्वालिटी इंडेक्स गिरकर 63 पर आ गया जो कभी कभी 500 के पार चला जाता है वहीं लोगों को गर्मी से थोड़ी सी राहत की हवा मिली लेकिन ये बारिश राहत वाली कम और आफत वाली ज्यादा थी दिल्ली के साथ आसपास वाले जो इलाके हैं यानि गोरोग्राम, नॉइडा और फरीदाबाद देखते ही देखते वैनिस बन गए। लेकिन उतने खूबसूरत नहीं, लेकिन फर्क ये था कि वैनिस में लोग गंडोला में बैठ कर घूमते हैं, और यहां लोग अपनी ही जिंदगी को डूबता हुआ देख रहे थे घर, गाडियां, सडकें और कई जगह तो इंसान भी डूब गए कई लाखों में पानी इतना भर गया कि लोग कमर से उपर तक डूबे खड़े थे दिल्ली एंसी आर की सडकों पर गाडियां पानी में तैरती हुई दिखी, नौइडा के सेक्टर पे चैन्वे के अंडर पास में एक एम्बुलेंस फस गई, पूरे शहर की रफतार जैसे किसी ने बीच सडक पर रोकती हो, गाडियां घंटो जाम में फंसी रही, इस सारी अफ मुंबई, बेंगलूरू, पुने, चंडीगर जैसे शहर हर मौनसून में इसी तरह पानी-पानी होते हैं. सिर्फ शहर ही नहीं, कई राज्यों का भी यही हाल हो जाता है. इस बार सबसे दर्दनाक तस्वीरें असम से आई हैं. असम के 12 जिलों के करीब 460 से ज्यादा गाउं बाड की चपेट में हैं जिससे तकरीबन 149,000 लोग प्रभावित हैं बाड से मरने वालों की संख्या 100 के पार पहुँच गई है तीन हजार से ज्यादा बेज़ुबान जानवरों की भी मौत हो गई है वैसे ये पहली बार नहीं हो रहा हर साल भारत का कोई ना कोई शहर या राज पानी में डूपता ही है 2005 में मुंबई, 2006 में सूरत, 2008 में कोसी, 2013 में उत्राखंड, 2015 में चेननई, 2018 में केरल और 2024 में यूपी बिहार में बाड जैसे हालात पनी National Institute of Disaster Management का डेटा कहता है कि साल 2000 से 2025 के बीच भारत में हर साल औसतन करीब 17 बाड की घटनाएं होती हैं हर साल औसतन करीब 1600 लोगों की जान जाती है हर साल करीब 80 लाख हेक्टेर फसल बरबाद होती है जिससे करीब 1800 करोड रुपए का सीधा नुकसान होता है अगर पूरे नुकसान की बात करें तो भारत में बार से हर साल औसतन करीब 7,000 करोड रुपए का सीधा आर्थिक नुकसान होता है। लेकिन जस साल बार ज्यादा भयानक हो वहां ये आंकडा कई गुना बढ़ जाता है। बार का सीधा असर आप पर भी पढ़ता है। 10 34 3 4 की वजह से एक आम दिल्लीवासी करीब एक हजार रुपए के बराबर समय और प्रोडक्टिविटी गमा देता है। यानि बार सिर्फ एक मौसमी हादसा नहीं हर साल दोहराई जाने वाली एक नैशनल ट्रेज़डी बन गई है। और अब शायद ये सब कुछ हमारे लिए न्यू नॉमल की तरह भी हो गया है। आखिर हर साल मौनसून की बारिश में भारत के शहर और गाउं क्यों डूबने लगते हैं? इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं. पहली वजह, short duration extreme rainfall है. IMD Bengaluru के scientist A. Prasad के मताबिक, कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होना ही बाड आने की सबसे बड़ी वजह है बीते करीब 10 सालों में क्लाइमेट चेंज की वजह से बारिश का पैटर्न पूरी तरह से बदल गया है देश के जाने माने क्लाइमेट साइंटिस्ट राजीवन माधवन नायर बताते हैं कि पहले साल भर में कुल जितनी बारिश होती थी आज भी लगबग उतनी ही होती है लेकिन अब फर्क ये आ गया है कि एक ही दिन में 100 मिलिमीटर बारिश या उससे ज्यादा बारिश हो जाने वाली घटनाएं बढ़ गई हैं यानि बारिश उतनी ही है लेकिन उसका गिरने का तरीका बदल गया है इंटेंसिटी बदल गई है पहले जो बारिश महीने भर में फैल कर बरसती थी अब वही कुछ घंटों में बरस जाती है अब समझिये कि प्रॉबलम्स आ कहां रही हैं ज्यादातर शहरों का Storm Water Drainage System यानी बारिश का पानी निकालने वाले नाले बेहत पुराने डिजाइन में बने हैं Ministry of Housing and Urban Affairs ने खुद 2019 के अपने एक मैनुवल में ये बात मानी थी ये drainage system इस असाप से बनाए गए थे कि साल में एक बार होने वाली सामाने से थोड़ी ज्यादा बारिश जिसे हम extreme rainfall कह रहे हैं उसका पानी निकाला जा सके यानि हमारे शहरों के नाले और सीवर दशकों पहले उस समय की बारिश को ध्यान में रखकर बनाए गए थे लेकिन अब कुछ ही घंटों में एक्स्ट्रीम रेइनफॉल होने लगी है और पुराने नाले इतना पानी संभाल ही नहीं पाते हैं इसका नतीजा है कि पानी सडकों पर भरने लगता है, अंडर पासेज में भरने लगता है, कॉलोनीज और मार्केट साइट्स टूप जाते हैं। मुंबई में अभी जो storm water drainage system का काम कर रहा है, वो अंग्रेजों ने 1860 के दशक में बनाया था. इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि एक घंटे में सिर्फ 25 मिलिमीटर बारिश का पानी निकाला जा सके. उस वक्त मुंबई की आवादी करीब 20 लाग थी लेकिन आज ये शहर 2 करोड से ज्यादा लोगों का घर है अब मुंबई में मौनसून के दोरान घंटों में ही 100 मिलिमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है सीधी सी बात है 160 साल पुराना सिस्टम आज की बारिश के सामने बॉना साबित होगा ही दिल्ली का हाल भी अलग नहीं है यहां का ड्रेनेज सिस्टम 1976 के स्टैंडर्ड के हिसाब से बना था 50 100 2 शालों में रैपिट रूरल टू अर्बन माइग्रेशन हुआ है यानि गाउं से लोग शहरों की तरफ बढ़े हैं हर रोज हजारों लोग नौकरी पढ़ाई और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की ओर आ रहे हैं अब इन लोगों के लिए घर स्कूल और बाकी बुनिय के लिए नहीं थे ये शहर के लिए बारिश के मौसम में नैचरल ड्रेनेज सिस्टम की तरह काम करते थे तेज बारिश होने पर ये वेटलेंज मौनसून के पानी को सोक लेते थे और धीरे धीरे उसे बाहर निकालते थे लेकिन अब इनकी जगह concrete और charcoal ने ले ली है ऐसे में अब बारिश का पानी जमीन में समाने की बजाए तेजी से सडकों पर भेटा है और फिर घरों में घुसता है इसके पीछे कोई complex science नहीं है सीधा सा logic है मान लीजिये कोई भी XYZ city है वहाँ पहले lakes, ponds और wetlands थे बारिश होती थी तो पानी इन में समा जाता था अब उनकी जगह वहाँ लोगों के घर, कॉपरेट आफिस, रोड्स और तरह तरह का कंस्ट्रक्शन वर्क हो गया है अब बारिश होती होगी तो पानी कहां जाएगा? वो रोड्स में भरेगा और बिल्डिंग में घुसेगा 1960 के दशक में बेंगलरू में 262 जीलें थी आज इन में से सिर्फ 17 जीलें अच्छी कंडीशन में है इंडियन इंस्टिटूट आफ साइंस बेंगलरू की एक स्टडी के मताबिक आज बेंगलरू के 93 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर बिल्डिंग और रोड्स बन चुकी हैं शहर का वाटर स्प्रेड एरिया 2324 हेक्टेयर से घटकर सिर्फ 696 हेक्टेयर रह गया है चेननई के हाला तो और भी खराब है 1970 में चेनदई में 600 से ज्यादा wetlands थे 2015 तक इनकी संख्या घटकर सिर्फ 27 रह गई मुंबई में बाड आना तो और भी चौंकाने वाला लगता है आप मैप देखेंगे तो शहर का बड़ा हिस्सा Arabian Sea से घिरा है बारिश का पानी समुद्र तक ले जाने के लिए मीठी, दहिसर, ओशिवारा और पॉईसर जैसी चार नदियां और चार खाडियां भी हैं ऐसे में बारिश का पानी बहुत आसानी से समुद्र में समा सकता है यानि कुदरत ने मुंबई को शानदार नैचरल ड्रेनेज दिया था लेकिन मीठी नदी जो मुंबई का सबसे एहम ड्रेनेश चैनल है उसकी औसत चोड़ाई ज्यादादर जगहों पर सिर्फ 10 मीटर रह गई है इन नदीयों का इंक्रोच्मिंट करके एरिया में बिल्डिंग और बस्तियां बस गई है मुंबई में हर दिन करीब 9000 टन कच्रा निकलता है जिसका बड़ा हिस्सा इन ही नदी नालों में जाकर जमा होता है नतीजा यह होता है कि थोड़ी सी बारिश में भी नदी के आसपास का इलाका डूब जाता है आईटी डेली के प्रोफेसर अश्विनी कुमार गोसाई कहते हैं कि अर्बन फ्लडिंग सिर्फ एक नैचुरल डिजास्टर नहीं है