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Summary
FCRA कानून बनाया गया था विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए, सरकार चाहती है कि विदेशी पैसा का हिसाब पता हो और उसका इस्तेमाल किसी भी तरह से प्रभावित न हो।
From the report
संसत का मौनसून सत्र चल रहा है, चर्चा होनी थी डीलिमिटेशन यानि परसीमन की, माना जा रहा था कि सरकार का अगला बड़ा दाओं उसी पर होगा, लेकिन पिछले कुछ दिनों में अचानक एक दूसरा कानून सारी सुर्खियां बटोरने लगा, FCRA संशोधन विधेक, FC इस्तेमाल कहां और कैसे होगा सरकार कहना है कि विदेशी पैसा अगर बिना निगरानी के देश में आता रहा तो उसका इस्तेमाल राजनीत, धर्म, समाज या राष्ट्री सुरक्षा को प्रभावित करने के लिए भी किया जा सकता है इसलिए विदेशी फंडिंग पर नजर रखना जरूरी है इसी मकसद से FCRA कानून बनाया गया था अब सरकार इसी कानून में कुछ नए बदलाओ करना चाहती है और यहीं से विवाद शुरू होता है दिल्चस बात यह है कि सरकार चाहे तो ये बिल आज ही संसत से पास करवा सकती है क्योंकि इसके लिए सिर्फ साधारल बहुमत चाहिए और एंडिये के पास उतने नमबर मौजूद है फिर भी सरकार जल्दबाजी नहीं कर रही है, आखिर क्यों? क्या सरकार अपने ही बिल पर नरम पड़ रही है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक गणित छपा है? दरसल कहानी सिर्फ FCRA की नहीं है इसके पीछे delimitation यानि परसीमन का भी पूरा गणित जुड़ा हुआ है क्योंकि जिन पार्टियों का समर्थन सरकार को delimitation जैसे बड़े सम्विधान संशोधन के लिए चाहिए वही पार्टिया FCRA संशोधन के मौजूदा सरूप का विरोध कर रहे हैं तो आखिर FCRA कानून बना क्यों था? सरकार इसमें क्या-क्या बदलाओ करना चाहती है? सबसे ज़्यादा विवाद किस प्रावधान पर है? चर्च और NGO क्यों विरोध कर रहे हैं? अमिश्चाह लगातार किन-किन प्रतिधी मंडलों से मुलाकात कर रहे हैं और क्या वाकई FCRA के वज़े से डिलिमिटेशन का रास्ता मुश्किल होता दिख रहा है सब कुछ विश्चार समझाते हैं नमस्ते मेरा नाम सौरप त्रिपाठी है आप न्यूस पिंच देख रहे हैं सबसे पहले समझते कि आखिर FCRA है क्या क्योंकि जब तक ये नहीं समझेंगे तब तक पूरा विवाद भी समझ में नहीं आएगा FCRA का full form है Foreign Contribution Regulation Act यानी विदेशी अंशदान विइनियमन अधिनियम माल लीजे भारत में कोई NGO है, कोई ट्रस्ट है, कोई चर्च, मंदिर, मस्जिद या गुर्दवारा है कोई स्कूल, कॉलेज, अस्पताल या रिसर्स संस्थान है अगर इन में से कोई भी संस्था विदेश से आर्थिक मदद लेना चाहती है तो वो सीधे पैसा नहीं ले सकती इसके लिए उसे ग्रह मंतराले के तहट FCRA रेजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है यही रेजिस्ट्रेशन उसे कानूनी तोर पर विदेशी चंदा लेने की अनुमती देता है इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि भारत ने विदेशी पैसा लेना गैर कानूनी है ऐसा नहीं है विदेशी फंडिंग पूरी तरीके से वैध है लेकिन सरकार चाहती है कि उससे हर पैसे का हिसाब पता हो पैसा किस देश से आया, किस संस्था ने भेजा, कितना भेजा, किस मकसस से भेजा और आखिर उसका इस्तमाल कहां हुआ, पूरा रिकॉर्ड सरकार के पास होना चाहिए लेंगे ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जो चाहेगा कि विदेश से आने वाला पैसा उसकी पीछे चलते हैं साल था 1976 तक देश में एमरजेंसी लगी हुई थी इसी तोरान इंद्रा गांधी सरकार ने पहली बार एफसी आरे कानून बनाया सरकार का तरफ कि कुछ विदेशी ताकतें भारत में काम कर रहे संगठनों को आर्थिक मदद देकर देश के अंदुरुनी मामलों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकती हैं। विदेशी फंडिंग के इस्तेमाल में ज्यादा पार्थरशिता और जवाब देही लाने की जरूरत है तब तीन बड़े बदलाव किया गया पहला बदलाव प्रशासनिक खर्च से जुड़ा था पहले कोई संस्था विदेशी चंदे का 50 प्रतीशत तक हिस्सा अपने विदेशियों की तनखवा, दफ़तर का खर्च, यात्रा, बिजली पानी और दूसरी विवस्थाएं। लेकिन 2020 के संशोधन के बाद ये सिमा घटा कर 20% कर दी गई। सरकार का कहना था कि विदेश से जो पैसा किसी खास उद्देश के लिए आता है उसका जादा से जादा हिस State Bank of India की एक निरधारिश शाखा में खोले गए, FCRA खाते में ही आएगा. सरकार का तरक था कि इससे हर लेन दिन पर नजर रखना आसान होगा और निगरानी ज़्यादा प्रभावी होगी. तीसरा बड़ा बदलाव सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा, पहले बड़ी NGO विदेशी चंदे का कुछ हिस्सा चोटी संस्थाओं को भी दे सकती थी ताकि वे गाउं और दूर जराज के इलाकों में काम कर सकें इसे सब ग्रांट कहा जाता था 2020 का संशोधन में इस विवस्था को खत्म कर दिया गया सरकार का कहना था कि पैसा जितने ज़ादा हाथों से गुजरता है उसकी tracking उतने ही मुश्किल हो जाती है इसलिए fund सीधे उस संस्था के पास रहे जिसे वो मिला है दूसरे तरफ कई सामाजिक संगठनों का कहना था कि इससे छोटे शहरों और ग्रामिनी इलाकों में काम करने वाले हजारों छोटे NGO प्रभावित हुए क्योंकि वे बड़ी संस्थाओं के जरीए विदेशी फंड तक पहुँच पाते थे यानि अगर पिछले 50 साल का इतिहास देखें तो एक बात साब दिखाई देती है चाहे सरकार कॉंग्रेस की रही हो या बीजेपी FCRA को समय समय पर और सक्त ही बनाया गया है फर्क सिर्फ इतना है कि हर सरकार ने इसके पिछे अलग-अलग तरक दिये हैं अब सवाल है कि जब 2020 में इतना बड़ा बदलाओ संशोधन हो चुका है, तो फिर 2026 में नए बदलाओ की ज़रूरत क्यों पड़ गई? आखिर सरकार अब ऐसा क्या बदलना चाहती है जैसे लेकर चर्च संगठन, एंजियो, विपक्ष और यहां तक कि कुछ विदेशी सांसत भी सवाल उठा रहे हैं। सरकार का कहना है कि इस बार का संशोधन कानून को पूरी तरीके से बदलने के लिए नहीं, 2026 पहला बदलाव पारदरशिता से जुड़ा है अब कोई भी संस्था विदेशी चंदा लेने से पहले सिर्फ इतना नहीं लिख पाएगी कि वो सामाजिक या धार्मिक काम करती है उसे विस्तार से बताना होगा कि पैसा किस खास परियोजना के लिए लाया जा रहा है किन राज्यों या केंद्र शाषित प्रदेशों में उसका इस्तमाल होगा और संस्था वास्तव में कौन-कौन से काम करती है यानि सरकार अब पहले से कहीं ज़्यादा स्पस्ट जानकारी चाहती है ताकि बाद में ये पता लगाना आसान हो कि पैसा उसी उद्देश पर खर्च हुआ या नहीं एरियम जून 2026 से लागू भी हो चुका है दूसरा बदलाव धार्मिक कत्विदियों को लेकर है सरकार ने साफ कर दिया है कि विदेशी चंदे का इस्तमाल धर्म परिवर्तन कराने के लिए नहीं किया जा सकेगा। बीच लगातार बाची चल रही है, जरा इसे एक उधारण से समझीए. माल लीजिए किसी संस्थाने पिछले 20 या 25 साल में विदेशी चंदे की मदद से एक स्कूल बनाया, एक अस्पताल बनाया, छात्राबास बनाया या समास सेवा के लिए कोई बड़ा केंदर खड़ा किया. अब किसी वज़े से उसका FCRA registration खत्म हो जाता है या समय पर renew नहीं हो पाता या सरकार उसे रद्ध कर देती है ऐसे सिते में उन संपत्तियों का क्या होगा यही तक आते आते मजूदा कानून लगभग चुप हो जाता है सरकार के कहना है कि इसी कानून एक खाली जगे को भरने के लिए नया संशोधन लाया गया है नए प्रस्ताओं को मताबग ऐसी स्थिती में विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों का प्रमंधन सरकार की ओर से नामित एक designated authority करेगी वही उनकी सुरक्षा, देख रहेगा और रख रखाओ की जिम्मेदारी समहली सरकार कहना है कि इसका मतलब संपत्ती का स्थाई अधिग्रहन नहीं है बलकि मकसद सिर्फ ये सुरक्षित करना है कि लाइसेंस खत होने के बाद संपत्ती लावारिस ना हो जाये और उसका दुर्पयोक ना हो यहीं से सरकार और विरोध करने वालों की सोच अलग-अलग हो जाती है सरकार कह रही है कि यह विवस्था पारदरशिता बढ़ाने, जवाबदही तै करने और राष्टी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जरूरी है लेकिन चर्च संगठन, NGO और विपक्षी दर इसे बिलकुल अलग नजरिये से देख रहे हैं उनकी पहली चिंता यह है कि कहीं छोटी सी प्रशास्टनी गलती की सजा बहुत बड़ी न बन जाए मान लीजिए किसी संस्था के से कागजी प्रक्रिया में कोई चूक हो गए समय पर रिनिवल का आविदन नहीं हो पाया या किसी दस्तावेज में तकनी की कमी रहेगे क्या ऐसी सिती में सालों की महनत से बने स्कूल, अस्पताल, सामाजिक संस्थानों का नियंतर सरकार के हाथ में चला जाएगा यही सवाल सबसे ज़्यादा उठाय जा रहा है Catholic Bishop Conference of India यानि की CBCI ने भी सरकार के सामने यही चिंता रखी है उनका कहना है कि अगर कोई संस्था वास्तव में देश विरोधी गतविधियों में शामिल है तो उस पर सक्त कारवाई जरूर होनी चाहिए विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधन के बाद ही हजारों संस्थाओं के FCRA रेजिस्ट्रेशन रद्ध हुए और विदेशी फंडिंग में बड़ी गिरावट आई। ऐसे में अगर नियम और सक्त किये गए तो सिक्षा, स्वास्थ और समास सिवा से जोड़े कई संस्थानों के काम पर असर पड़ सकता है। यही वज़ाय कि सरकार सिर्फ संसत के भीतर बहस का इंतजार नहीं करती, बलकि संसत के बाहर भी लगातार बाचीत कर रही है। ग्रेह मंत्री अमिशा पिछले कुछ समय में चर्च के कई प्रतिनिधी मंडलों से मुलाकात कर चुके हैं, कैथुलिक बिशप कॉन्फरेंस ओफ एंडिया के प्रतिनिधीयों के साथ उनकी बैठक हुई, मिजोरम के मुख्य मंतरी ने भी उनसे मुलाकात कर अपनी चिंताएं रखी अब चर्च के वरिष्ट विशप और दूसरी प्रतिरिदी मंडल भी सरकार के साथ बाचचीत कर रहे हैं सरकार की कोशिश यही है कि संसद में चर्चा शुरू होने से पहले जितनी जादा सहमती बन सके उतना बहतर होगा इसी तोरान एक और सवाल उठा कि क्या नया कानून पुराने मामलों पर भी लागू होगा यानि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस कई साल पहले खत्म हो चुका है क्या उनकी संपत्नियां भी इस दारे में आएंगी उस पर ग्रहिमंत्री अमिशा पहले साफ कर चुके हैं कि संशोधन रेटरोस्पेक्टिव यानि पिछली तारीक से लागो नहीं होगा सरकार के कहना है कि नए नियम सिर्फ आगे की परिस्थितियों पर लागो होंगे अब यहां तक की कहानी कानून की थी लेकिन यही से इसमें राजनीत की एंट्री होती है क्योंकि सरकार के सामने चुनौती FCRA पास करानी की नहीं है चुनोती उससे कहीं बड़े लक्ष की है सरकार का असली फोकस डीलिमिटेशन यानि परसीमन से जुड़े सम्मिधान संशोधन पर है और यही वो जगए है जहां पूरा राजनीतिक गणित पदल जाता है FCRA एक सामान्य विधेख है इसे पास कराने के लिए साधारन बहुमत काफी है और सरकार के पास वो संख्या मौजूद भी है लेकिन D-Limitation सम्विधान संशोधन है वहाँ दो तिहाई बहुमत चाहिए यानि सरकार को NDA से बाहर की पार्टियों का समर्थन भी चाही होगा समस्या यह है कि जिन पार्टियों उसे सरकार डिलिमिटेशन पर समर्थन चाहती है उनी में से कई FCRA संशोधन के मौजूदा स्वरूप का विरोध कर रही है डीम के, शर्त वार गुट के, इनसीपी, वायसर कांग्रेज जैसी पार्टियां अलग-अलग वजहों से इस बिल पर सवाल उठा रहे हैं कुछ इसे जेपीसी के पास भेजने की मांग भी कर रहे हैं, कुछ इसमें बदलाव चाती हैं यानि अगर सरकार एबी FCRA को लेकर सक्ती दिखाती है, तो यही दल बाद में डिलिमिटेशन पर उसके लिए मुश्किले खड़ी कर सकते हैं. और अगर FCRA पर नर्मी दिखाती है, तो विपक्ष कहेगा कि सरकार अपने ही बिल पर पीछे हड़ गई. यही वजह है कि राजनीतिक विशलेशक इसे सरकार के लिए एक cash 22 की सिती पता रहे हैं जहां दोनों रास्तों पर राजनीतिक जोखिम मौजूद है यानि FCRA का विवाद अब सिर्फ विदेशी चंदे तक सीमित नहीं रह गया इसमें राष्ट्री सुरक्षा का तर्क भी है, चर्च और एंजियों की चिंताएं भी है, संसत का नंबर गेम भी है और डी लिमिटेशन जैसा सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक एजन्डा भी है। अब देखना यही होगा कि सरकार बाचित के जरिये सहमत्ती बनाती है, कुछ प्रावधानों में बदलाव करती है।