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Summary
भारत और म्यांमार के बीच सीमा विवाद, मनिपुर में जमीन की अदला बदली का प्रस्ताव, केंद्र सरकार का तर्क सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और सीमा की स्पष्टता, लेकिन मनिपुर के कई संगठनों का तर्क जमीन, पहचान और क्षेत्रीय अखंडता
From the report
मनिपुर के चंदेल जिले में भारत और मैनमार की सीमा से जुड़ी एक इंटरनाशनल रिपोर्ट ने नया विबाद खड़ा कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि दोनों देश सीमा के एक छोटे हिस्से में जमीन की अदला बदली पर विचार कर रहे हैं। लेकिन क्या सचमुच भारत अपनी जमीन मैनमार को देने जा रहा है? Ministry of External Affairs ने इस पर क्या कहा? मनिपुर में इसका इतना तीखा विरोध क्यों हो रहा है? और आखिर 2.8 किलोमेटर के इस सीमा शेत्र का इतिहास क्या है? आज हाकीकत को विस्तार से समझेंगे. नमस्कार मेरा नाम वरुन है और आप देख रहे हैं जिस्ट पूरा विवाद 17 जुलाई 2026 को सामने आया जब American Magazine The Diplomat ने एक document का हवाला देते हुए report publish की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मनिपुर के चंडेल जिले में भारत और मैनमार के बीच सीमा के एक छोटे से हिस्से की अदलाबदली के प्रपोजल पर विचार हो रहा है। रिपोर्ट के मताबिक, पिलर नंबर 65 से 68 के बीच करीब 2.8 किलोमेटर लंबे और लगभग 1.4 स्कॉयर माईल एरिया की सीमा का डीमारकेशन अगले कुछ महिनों में पूरा किया जा सकता है। रिपोर्ट सामने आने के बाद, Ministry of External Affairs से सवाल पूछे गए। MEA के spokesperson Randhir Jaiswal ने कहा कि भारत और मैंमार के बीच सीमा के कुछ हिस्से अभी पूरी तरह तैन नहीं हुए हैं और उन पर दोनों देशों के बीच बातचीद जारी है। हाला कि उन्होंने ये कहीं नहीं कहा कि भारत कोई जमीन ट्रांसफर कर रहा है या फिर ऐसा कोई अंतिम फैसला दिया जा चुका है। यही इस पूरे विवाद का एहम पहलू भी है। एक तरफ दिप्लोमैट की रिपोर्ट एक प्रपोजल का जिक्र करती है जबकी दूसरी तरफ भारत सरकार सिर्फ सीमा डीमारकेशन को लेकर बाचीत की पुष्टी करती है। अब तक ना तो इस संबंध में कोई उफिशल अग्रिमेंट हुआ है, ना कैबिनेट ने कोई मनजूरी दी है और ना ही पार्लियामेंट के सामने ऐसा कोई प्रपोजल रखा गया है। यानि फिलहाल ये सिर्फ बाचीत के स्तर पर है, कोई अंतिम निर्णय नहीं है। लेकिन मनिपुर की मौजूदा स्थिती को देखते हुए इस खबर ने तुरंत राजनीतिक रंग ले लिया। साल 2023 से चल रहे तनाव के बाद मनिपुर में सीमा और जमीन से जुड़ा हर मुद्धा बेहद सेंसिटिव बन चुका है। इसी वज़े से रिपोर्ट सामने आते ही कई सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई और सोशल मीडिया पर ये दावा तेजी से फैलने लगा कि भारत मनीपुर को जमीन सौप रहा है। भारत और मैनमार के रिष्टे सिर्फ नेबरिंग कंट्रीज वाले नहीं हैं, बलकि स्ट्रैटेजी, एकॉनमी और सिक्योरिटी के लिहास से भी बहुत जरूरी हैं. मैनमार भारत का साउथीस्ट एशिया में एक मात्र पडोसी है और आक्ट इस्ट पॉलिसी का एहम हिस्सा माना जाता है नौर्थीस्ट इंडिया को साऊथीस्ट एशिया से जोड़ने वाले कई बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे इंडिया-मैनमार-थाइलेंड ट्राइलेटरल हाइवे और कालादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट यहीं से होकर गुजरते हैं। 2021 2021 पॉलिसी अपना ही है यही वजह है कि सीमा से जुड़ा कोई भी फैसला सिर्फ स्थानिय नहीं बलकि भारत की व्यापक विदेश और सुरक्षा पॉलिसी से भी जुड़ा हुआ माना जाता है लेकिन भारत और मैनमार के बीच का ये सीमा विवाद आखिर क्या है और ये छे दशक बाद भी पूरी तरह सुलज क्यों नहीं पाया भारत और मैनमार के बीच करीब 1643 किलोमेटर की लंबी इंटरनाशनल बॉर्डर है जो अरुनाचल प्रदेश, नागालैंड, मनीपूर और मिजोरम से होकर गुजरती है दूसरी तरफ मैनमार के सगाईंग रीजन और चिन स्टेट है ये पूरा इलाका घने जंगलों और उंचे पहाडों से घिरा हुआ है बॉर्डर के दोनों तरफ एक तरह की ट्राइबल कम्युनिटीज के लोग रहते हैं इसलिए ये सिर्फ एक इंटरनाशनल बॉर्डर नहीं बलकि सामाजिक और सांस्क्रितिक रूप से भी बेहत सेंसिटिव एरिया है भारत और मैनमार ने 1967 में बॉर्डर अग्रिमेंट पर हस्ताक्षर किये थे इस अग्रिमेंट में दोनों देशों की सीमा की रूप रेखा तै कर दी गई थी लेकिन जमीन पर हर बिंदू का सटीक डीमारकेशन उस समय पूरा नहीं हो पाया यही वज़े है कि आज भी पूरी सीमा पूरी तरह माग नहीं है करीब 1643 किलोमीटर की सीमा में से 1472 किलोमीटर हिस्से पर बाउंडरी पिलर्ट्स लगाए जा चुके हैं लेकिन लगभग 171 किलोमीटर का हिस्सा अभी पूरी तरह तै नहीं माना जाता है इन में सबसे सेंसिटिव एरिया अरुनाचल प्रदेश का लोहित सेक्टर और मनिपूर का कबाब वैली माना जाता है भारत और मैनमार के ओफिशियल्स पिछले कई सालों से इसी बचे हुए हिस्से के डीमारकेशन पर बाचीत कर रहे हैं सरकार का कहना है कि ये कोई नया बॉडर डिस्प्यूट नहीं है और नाहीं दोनों देशों के बीच किसी बड़े लैंड एरिया को लेकर तकराव है। सरकार के मुताबिक, मामला केवल कुछ boundary pillars की सटीक position तै करने का है, ताकि international border को जमीन पर सपश्ट रूप से mark किया जा सके. हालिया विवाद भी इसी process से जुड़ा हुआ है. रिपोर्ट्स में जिस एरिया का जिक्र किया गया वो मनिपूर के चंदेल जिले में पिलर नमबर 65 और 68 के बीच का लगभग 2.8 किलोमिटर लंबा इलाका है ये शेत्र मैनमार की कवाब बैली से सटा हुआ है और सिक्योरिटी के लिहाज से बहत सेंसिटिव माना जाता है मिलिटेंसी और क्रॉस बॉर्डर मुवमेंट जैसे मुद्धों की वज़े से इस हिस्से का सटीक सिमांकन दोनों देशों के लिए महत्पून माना जा रहा है यानि अब तक जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक विवाद नई सीमा बनाने का नहीं बलकि पहले से तै सीमा को जमीन पर स्पश्टूप से आइडिंटिफाई करने का है हला कि इसी प्रोसेस के दोरान इस लैंड अजजस्मेंट की खबर ने पूरे मामले को राजनीतिक विबाद में बदल दिया है अब ये समझते हैं कि अगर ये सिर्फ 2.8 किलोमेटर का इलाका है तो भारत इस पर इतना गंभीर क्यों है इसके पीछे कई स्ट्रटीजिक और सिक्योरिटी से जुड़े कारण है सबसे पहली वज़े है सीमा का हमेशा के लिए डी मारकेशन करना वजह पूरी सीमा की फेंसिंग लगाना है साल 2024 में केंद्र सरकार ने भारत और मेनमार की पूरी 1643 किलोमीटर लंबी सीमा पर स्टेप बाइस्टेप फेंसिंग करने की घोषणा की थी लेकिन किसी भी इंटरनेशनल बॉर्डर पर फेंस बढ़ाने से पहले यह तैह होना जरूरी है कि सही बॉर्डर लाइन कहां है जब तक हर पिलर और हर बॉर्डर पॉइंट साफ नहीं होगा तब तक फेंसिंग का काम आगे नहीं बढ़ सकता तीसरी वजह सिक्योरिटी से जुड़ी है साल 2021 में मैनमार में एलिटरी कूप के बाद वहां सिविल वार जैसी स्थिति बनी हुई है इसका असर भारत के बॉडर वाले इलाकों पर भी पड़ा है सिक्यॉरिटी एजेंसी लंबे समय से यह कहती रही है कि सीमापार्थ से मिलिटेंट मूवमेंट वेपन्स और ड्रग्स की प्रमगलिंग जैसी चुनौतियां इस ओपन बॉर्डर की बज़े से और भी गंभीर होती जा रही है। सरकार का कहना है कि एक डिफाइन बॉर्डर और बेहतर मॉनिटरिंग से इन खत्रों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। फेंसिंग और डीमारकेशन दोनों ही इस सिक्यॉरिटी पॉलिसी का हिस्सा माने जाते हैं। जहां तक 1.4 स्क्वेर माईल एरिया की चर्चा है, अब तक सामने आई रिपोर्ट के अनुसार ये किसी एक तरफा लैंड ट्रांसफर का प्रपोजल नहीं है। दावा ये है कि अगर ऐसा कोई अग्रिमेंट होता भी है तो उसका उद्देश बॉर्डर लाइन को दोनों देशों के लिए और सपष्ट बनाना होगा। अलाकि भारत सरकार ने अब तक ऐसे किसी proposal की आधिकारिक रूप से मनजूरी दिये जाने की पुष्टी नहीं की है। यानि सरकार का तरक security, border management और demarcation का है। लेकिन मनिपुर में कई organizations इसे सिर्फ technical process नहीं मान रहे हैं। उनके लिए ये जमीन, identity और territorial integrity का सवाल है। तो आखेर मनिपूर के भीतर इस प्रपोजल की खबर का इतना तीखा विरोध क्यों किया जा रहा है और स्थानी औरगनाइजेशन को किस बात का डर सता रहा है सबसे पहले विरोध की आवाज कॉर्डिनेटिंग कमिटी और मनिपूर इंटेग्रिटी यानी कोकोमी की तरफ से आई औरगनाइजेशन ने रिपोर्ट सामने आने के बाद चिताबनी दी कि अगर मनिपूर की जमीन का कोई भी हिस्सा मैनमार को सौपने या अदला बदली करने की कोशिश की गई तो इसका कड़ा विरोध किया जाएगा। और भी बढ़ गई है। राज में पहले से ही मैनमार बॉर्डर के रास्ते इलिगल इन्फिल्ट्रेशन, मिलिटिंट अक्टिविटीज और पॉपिलेशन बैलेंस को लेकर चिंताएं मौजूद हैं। ऐसे माहोल में बॉर्डर से जुड़ी किसी भी खबर को लोग बेहत गंभीरता से देखते हैं। 1949 में मरजर का भी जिक्र किया था. ओर्गनाइजेशन का कहना है कि मनिपूर पहले से ही अपने हिस्टॉरिकल टेरोटेरी का एक हिस्सा खो चुका है. इसलिए अब मौजूदा सीमा में एक इंच भी कमी स्विकार नहीं की जाएगी इसके साथ ही ये फेडिरलिजम का भी सवाल बन गया है हाला कि इंटरनेशनल बॉर्डर्स पर फैसला लेना केंदर सरकार का अधिकार है लेकिन मनिपूर जैसे सेंसिटिव स्टेट में लोकल कम्युनिटीज और उनके पबलिक रीपरेजेंटिटिव्स को विश्वास में लिये बिना उठाया गया कोई भी कदम पॉलिटिकल टेंशन को बढ़ा सकता है यही वज़े है कि कई औरगनाइजेशन्स मांग कर रहे हैं कि अगर सीमा से जुड़ा कोई भी प्रपोजल है तो उसे पूरी ट्रांसपेरिंसी के साथ सार्वजनिक किया जाए यानि एक तरफ केंदर सरकार इसे बॉर्डर मैनेजमेंट और सिक्योरिटी का मामला बता रही है तो दूसरी तरफ मनिपूर के कई ओर्गनाइजेशन्स इसे राज्य की आइडेंटिटी और इंटेग्रिटी को खत्रा मान रहे हैं ऐसे में ये समझना जरूरी है कि इन दोनों दावों के बीच सचाई क्या है क्या सच में भारत मेंमार को अपनी जमीन देने जा रहा है या फिर ये अधूरी जानकारी और अफ़वाओं के बीच पैदा हुआ विवाद है अब तक विदेश मंतराले ने सिर्फ इतना ही कहा है कि भारत और मेंमार के बीच सीमा के कुछ अन्रिजॉल्व हिस्से पर बातचीद जारी है। सरकार ने कहीं भी ये नहीं कहा कि जमीन की अदला बदली का अगरिमेंट हो चुका है। जिस प्रपोजल का जिक्र मीडिया रिपोर्ट्स में किया गया, वो अभी विचार के स्तर पर हैं. ना उसे क्राबिनेट में मनजूरी मिली है और ना ही पार्लियामेंट के सामने कोई आधिकारिक प्रपोजल रखा गया है. भारत में किसी भी इंटरनेशनल बॉर्डर में बदलाव का एक कॉंस्टिटूशनल प्रोसेस होता है अगर कभी दो देशों के बीच जमीनी एक्स्चेंज या बॉर्डर में बदलाव करने पर सहमती बनती है तो उसके लिए इसे Technical Survey, Joint Border Commission की Recommendations, Diplomatic Agreement और उसके बाद Parliament की मनजूरी जैसी कई स्टेजेस से गुजडना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा एक्जांपल 2015 का India-Bangladesh Land Boundary Agreement है। इस Agreement से पहले Parliament पे लंबी बहस हुई, constitutional amendment हुआ और उसके बाद ही दोनों देशों के बीच जमीन का आदान प्रदान लागू हो सका यानि सिर्फ बाचीत या proposal का मतलब ये नहीं होता कि फैसला हो चुका है अगर मैनमार के साथ भी भविशे में ऐसा कोई agreement होता है तो उसे भी इसी तरह की कानूनी और कॉंस्टिटुशनल प्रोसेस से गुजड़ना पड़ेगा इसलिए फिलहाल ये कहना कि भारत अपनी जमीन मैनमार को सौप रहा है आधिकारिक जानकारी के अधार पर सही नहीं होगा इस पूरे विवाद के केंदर में सिर्फ 1.4 स्क्वायर माईल जमीन नहीं है एक तरफ भारत की बॉर्डर सिक्योरिटी, फेंसिंग और इंफिल्ट्रेशन रोकने की स्ट्राटेजी है दूसरी तरफ मैनमार के साथ डिप्लोमाटिक रिलेशन्स है और तीसरी तरफ मनिपुर के लोगों की रीजिनल आइडेंटिटी सिक्योरिटी और भरोसे से जुड़ी चिंताएं हैं।