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Summary
प्रशांत किशोर ने बांकीपूर असिंबली सीट जीत ली है, बीजेपी के नीरज सिनहा को करीब 19,000 वोटों के अंतर से हराया है।
From the report
देश के अलग-लग राज्यों में हुए बाई एलेक्शन्स के नतीजे आ गए हैं। गुजरात के मांजलपूर में भारतिय जन्ता पार्टी के सतेंद्र भाई पटेल और मध्यप्रदेश के दत्या में इंडियन नैशनल कॉंग्रेस के घंश्याम सिंग ने जीत दर्च की है लेकिन बिहार के बांकीपूर सीट का नतीजा सबसे अलग और सबसे बड़ा माना जा रहा है चन्सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपूर असिंबली सीट जीत ली है उन्होंने बीजेपी के नीरज सिनहा को करीब 19,000 वोटों के अंतर से हरा दिया है बिहार की राजनीती में लंबे समय से मुकाबला सिर्फ दो ध्रूबों के बीच में माना जाता था एक तरफ NDA और दूसरी तरफ महा गटबंदन लेकिन अब इस तस्वीर में एक तीसरा नाम जुड़ गया है पत्ना की सबसे प्रतिस्टित असेम्बली सीटों में से एक बांकीपुर से आया चुनावी नतीजा बता रहा है कि बिहार की राजनीती अब पहले जैसी नहीं रहने वाली है बीजेपी जो इस सीट को सालों से अपने सबसे मजबूत गढ़ों में गिनती रही है उसे यही हार का सामना करना पड़ा है लेकिन ये जीत सिर्फ एक असेम्बली सीट जीतने की कहानी नहीं है ये प्रशांत किशोर के राजनीतिक जीवन का अब तक का सबसे बड़ा माइलस्टोन माना जा रहा है क्या हुआ इस चुनाव में और आखिर प्रशांत किशोर ने ये सीट कैसे जीती इसे विस्तार में समझेंगे इस वीडियो में नमस्कार मेरा नाम वरुन है और आप देख रहे हैं जिस्ट बांकीपूर सिर्फ पत्ना का एक असिंबली कॉंस्टिटुवेंसी नहीं है ये बिहार की राजधानी का राजनीतिक और प्रसाशनिक केंद्र माना जाता है विधान सभा सेक्रेटरियेट, बड़े सरकारी दफतर, राज की सक्ता से जुड़े कई महत्पुन संस्थान इसी लाके के आसपास मौजूद हैं इसलिए सीट को हमेशा से बिहार की सबसे हाई प्रोफाइल असिंबली सीटों में गिना जाता रहा है सोशल परस्पेक्टिव से भी बांकीपुर की अपनी अलग पहचान है यहां एजुकेटिड वोटर, सरकारी करमचारी, व्यापारी और उच वर्क के वोटरों की बरी हिस्सेदारी है यही वज़े है कि यहां के चुनावी मुद्दे भी अकसर बाकी बिहार से अलग होते हैं बांकीपूर में 30 साल से भाजपा को कोई हरा नहीं पाया था 1995 से लगातार सीट पर बीजेपी का कबजा था पहले नवीन किशोर प्रसाद सिनहा और उसके बाद उनके बेटे नितिन नवीन लगातार यहां से चुनाव जीते रहे हैं 2025 के चुनाव में बांकिपूर के विधायक चुने गए बीजेपी के राष्ट्री अध्यक्ष नितिन नवीन राजसभा चले गए इसके बाद उन्होंने असेंबली से स्थिफा दे दिया जिससे ये सीट खाली हुई और बाई एलेक्शन करवाने पड़े अब प्रशांत किशोर ने ये सीट जीत ली है यही वो प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने पिछले एक दशक में भारत की कई सबसे बड़े चुनावी अभियानों की स्ट्राटेजी तैयार की हैं साल 2014 में नरेंदर मोदी की अतिहासिक जीत 2015 में बिहार में नितीश कुमार की सत्ता में वापसी 2017 2021 2021 भारतिय राजनीती में उनकी पहचान हमेशा से एक किंग मेकर की रूप में रही वो चुनाव जिताते रहे, सरकारे बनवाते रहे, लेकिन खुद कभी चुनावी मैदान में नहीं उतरे लेकिन बांकीपूर बाई एलेक्शन ने ये कहानी बदल दी है पहली बार प्रशान किशोर अपनी ही बनाई पाटी के साथ चुनाव लड़े पहली बार जनता से अपने लिए वोट मांगे और पहले ही चुनाव में जीत हासिल कर ली जन सुराज एक नई पाटी है उसके पीछे दशको पुराना कोई संगठन नहीं है कोई स्थापित जातिये वोट बैंक भी नहीं था, कोई राजनीतिक परिवार या वंशवाद नहीं था, सत्ता की सरकारी मशीन भी उसके साथ नहीं थी, इसके बावजूद बिहार की राजधानी की सबसे एहम सीट पर जीत दर्ज करना ये संकेत देता है कि राज की राजनीत यही है कि आखिर बांकीपुर जैसे बीजेपी के 30 साल पुराने गड में प्रशांत किशोर जीतने में कैसे काम्याब हो गए। इस जीत के पीछे सिर्फ एक वज़े नहीं थी। सोशल स्ट्रक्चर, लोकल मुद्दे, स्ट्रैटेजी और विपक्ष की कमजोरियां कई ऐसे फैक्टर्स थे जिन्होंने मिलकर नतीजा बनाया. सबसे पहली वज़े रही बीजेपी के लेगेसी वोट बैंक में नाराज़गी. पॉलिटिकल एनिलिस्ट का मानना है कि भरत तिवारी एंकाउंटर के बाद ब्रामन भुमियार और राजपूत समाज के एक हिस्से में सरकार के खिलाफ नाराजगी थी ये तीनों वर्ग लंबे समय से बीजेपी के कोर वोटर बैंक माने जाते हैं चुनाव प्रचार के दोरान प्रशांत किशोर ने इसी नाराजगी को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश की उन्होंने अपरकास्ट बहुल इलाकों में, बिजनिस असोसियेशन्स में और रेसिडेंशल सोसाइटीज में लगातार छोटी बैठों के जरिये संदेश दिया कि बीजेपी ने अपने समर्थकों को हलके में लेना शुरू कर दिया है दूसरी बड़ी वज़े यंग वोटर्स का गुस्सा माना जा रहा है नीट पेपर लीक विवाद और उसके बाद छात्रों के विरोध प्रदर्शन ने बिहार के युवाओं में सरकार के प्रती गुस्सा पैदा कर दिया था चुनाव ऐसे समय में हुआ जब सिख्षा और रोजगार जैसे मुद्धे लगातार चर्चा में थे राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बदलाव की इसी भावना का फायदा जनसुराज को मिला और बड़ी संख्या में युवा मददाता उसके पक्ष में दिखाई दिये तीसरी वज़े रही प्रशांत किशोर का बेहद आक्रमक एलेक्शन कैम्पेइन जहां दूसरी पॉलिटिकल पार्टीज ट्रेडिशनल रैलीज कर रही थी वहीं प्रशांत किशोर ने लगभग पूरे महिने बांकीपूर की गलियों में लगातार जन संपर्क किया बाखीपूर जैसे शहरी शेतर में प्रशान किशोर ने कास्ट कार्ड प्ले नहीं किया उससे ज़ादा उन्होंने ड्रेनेज, जल भराव, ट्राफिक, सडक, हायर एजुकेशन और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे उठाए उनकी टीम लगातार लोगों से बातचीत करके ये उन्हें बताती रही कि राजधानी के बीचो बीच स्थित इस इलाके की मूल भूत समस्याएं आज भी जच्च की तस हैं इस नैरेटिव ने शहरी मददाताओं के बीच असर छोड़ा पाँचवी वजह उनकी राजनीतिक छवी में बदलाव माना जा रहा है इस चुनाव में प्रशान्त किशोर ने मंदिरों के दर्शन किये धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लिया और अपनी इमेज को पहले की तुलना में ज्यादा कल्चरल और डाउन टू अर्थ बनाने की कोशिश की इसके अलावा ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये एक बाई एलेक्शन था पूरे बिहार में चुनाव लडने के बजाए जन सुराज अपनी पूरी राजनीतिक ताकत एक जगह केंदरित कर सका यानि ये जीत किसी एक मुद्दे की नहीं थी ये स्थानिय नाराजगी, युवा मददाताओं, मजबूत जमीनी अभियान, शहरी मुद्दों, विपक्ष के बिखराव और सटीक चुनावी स्ट्रैटीजी का मिला जुला परिनाम था प्रशान्त किशोर की कहानी दूसरे राजनिताओं की कहानी जैसी नहीं है उन्होंने राजनीती की शुरुवात चुनाव लड़कर नहीं बलकी चुनाव जितवा कर की थी भारत में जिस पेशे को आज पॉलिटिकल कंसल्टिंग कहा जाता है उसे पहचान दिलाने वाले लोगों में प्रशांत किशोर का नाम सबसे उपर आता है उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल आक्शन कमीटी यानी आईपैक की स्थापना की और चुनावी स्ट्राटेजी को एक संगठित प्रोफेशन के रूप में आगे बढ़ाया उनका मॉडल ट्रेडिशनल पॉलिटिक से अलग था डेटा अनिलिस्ट, बूत लेवल माइक्रो प्लानिंग, वोटर रीसर्च, लोकल मेसेजिंग और ग्राउंड कैम्पेइन इन सब को जोड़ कर वो चुनावी स्ट्राटिजी तैयार कर दे थी यही वज़े थी कि एक समय ऐसा आया जब भारतीय राजनीती में ये धारना बन गई कि जिस पार्टी के साथ प्रशांत किशोर होंगे उसकी जीत तै है साल 2014 में नरेंदर मोदी के नेतरित्व में बीजेपी की अतिहासिक जीत, 2015 में बिहार में नितीश कुमार की वापसी, 2017 में पंजाब में अमरिंदर सिंग की सरकार, और 2021 में पश्चिम-बंगाल में मम्ता बनर जी की लगातार तीसरी जीत. इन सभी चुनावों के पीछे प्रशांत किशोर की स्ट्राटेजी की चर्चा होती आई है यही वजए थी कि उन्हें भारतीय राजनीती का सबसे सफल चुनावी रननीतिकार और किंग मेकर कहा जाने लगा लेकिन हर कहानी में एक मोड आता है साल 2022 के पंजाव असंबली एलेक्शन में कॉंग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। election consulting strategy अगर बदलाव लाना है तो मैदान में उतर कर सीधे जनता के बीच जाना होगा यहीं से उनके राजनीतिक सफर का दूसरा अध्याय शुरू हुआ उन्होंने अपने होम स्टेट बिहार में जनसुराज अभियान की शुरूवात की उनका कहना था कि बिहार को सिर्फ नई सरकार नहीं बलकि एक बहतर गवर्णनेंस और नई पॉलिटिकल कल्चर की जरूरत है इसी सोच के साथ उन्होंने जनसुराज को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में शुरू किया जिसका उदेश था लोगों की भागीदारी से पहतर गवर्णनेंस स्थापित करना तिलजस्पात यह है कि शुरुवात में प्रशान किशोर खुद चुनाव लडने के पक्ष में नहीं थे उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा था कि उनका मकसच चुनाव लड़ना नहीं है बलकि योग्य उमिदवारों को आगे लाना है वो खुद संगठन बनाने और राजनीतिक विकल्पों को तैयार करने पर जोर देते हैं लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती गई जनसुराज एक राजनीतिक दल बन गया बिहार में संगठन तयार हुआ लेकिन जब 2025 में बिहार असिंबली एलेक्शन हुए उन्हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा 2025 असिम्बली एलेक्शन में जनसुराज ने बिहार की 243 सीटों में से 238 सीटों पर चुनाव लडा था मगर वो एक भी सीट नहीं जीत पाए और जब बांकीपूर बाई एलेक्शन का मौका आया तो प्रशान किशोर ने खुद मैदान में उतरने का फैसला किया यही फैसला उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोर साबित हुआ जिस वेक्ती को देश अपतक किंग मेकर के नाम से जानता था वो पहली बार खुद जनता के बीच वोट मांगने निकला और पहली ही बार परिक्षा उसने पास कर लिया अब बांकीपूर बाई एलेक्शन खत्म हो चुका है प्रशान किशोर जीट चुके है लेकिन क्या ये जीट सिर्फ एक सीट तक सीमित रहेगी या बिहार की पूरी राजनीती को बदलने वाली शुरुवात बनेगी बांकीपूर एक शहरी असिम्बली सीट है यहां ज्यादा पढ़े लिखे वोटर्स है सरकारी करमचारी हैं, व्यापारी हैं और अपरकास्ट वोटर की बड़ी हिस्सेदारी है लेकिन बिहार की 243 असिम्बली सीटों की तस्वीर इससे बिलकुल अलग है राज्य की ज़्यादातर सीटे ग्रामीन शेतर की हैं जहां चुनाव आज भी जाती के आधार पर होता है सबसे बड़ा वोट बैंक OBC और EBC कम्यूनिटी का है ऐसे में सवाल ये है कि जो संदेश बांकीपूर में काम कर गया क्या वही शंदेश बिहार के गाउं और छोटे कस्बों में उतना ही असरदार रहेगा अगर आप प्रशान्त किशोर के जीवन और पॉलिटिकल करियर के बारे में विस्तार से जानना चाते हैं तो जिस्ट की पेशकश दुनिया रोज बनती है का ये एपिसोड देख सकते हैं। लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा। प्रशान किशोर की जीत और जनसुराज के भविष्य पर आप क्या सोचते हैं अपनी राय कॉमेंट्स में जरूर बताएं। देश और दुनिया की बड़ी खबरों के लिए देखते रहें जिस्ट. शुक्रिया.