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Summary
सुप्रीम कोर्ट ने मनमोहन सिंह के खिलाफ कोयला घोटाले के मामले में CBI की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया।
From the report
History will be kinder to me than the contemporary media History will be kinder to me than the contemporary media यानि इतिहास मेरे साथ आज के मीडिया से ज़्यादा न्याय करेगा साल 2014 में कहेगे ये शब्द सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं थे ये उस इंसान का भरोसा था जो अपने उपर लगे आरोपों, आलोचनाओं और सवालों के बीच भी इस उम्मीद को जिन्दा रखे हुए था कि वक्त एक दिन उसकी पूरी कहानी को समझेगा लेकिन शायद इतिहास ने उनके साथ नियाय करने में थोड़ी देर कर दी क्योंकि जिस फैसले के इंपिजार डॉक्टर मनमोहन सिंग ने अपने जिन्दिगी में किया वो फैसला उनके जाने के बाद आया। करीब बारा साल बाद सुप्रीम कोट ने उस कोईला ब्लॉक आवंटन मामले को बंद कर दिया जिसने उनके प्रधान मंतरी पत के आखरी वर्षों पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया था। तौर की कहानी है जब देश के सबसे शान सभाव वाले प्रधान मंत्रियों में से एक व्यक्ति अचानक सबसे बड़े राजनीतिक विवाद के केंदर में आ गया था। एक तरफ वो मनमोहन सिंग थे जिनोंने 1991 में भारत को आर्थिक संकट से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। दूसरी तरफ वही मनमोहन सिंग थे जिनके दूसरे कारिकाल को भ्रष्टाचार की आरोपों और नीतिकत पंगुता के सवालों से जोड़ दिया गया। उनके आलोचकों ने उन्हें मौन प्रधान मंत्री कहा। सवाल ये नहीं था कि उन्होंने खुद कोई निजी फाइदा उठाया या नहीं। सवाल ये था कि क्या उनके नेतरत्वाली सरकार में ऐसे फैसले हुए जिन से देश को नुकसान पहुचा। CBI प्रस्ते मेरा नाम सौरप तृपाठी है आप न्यूस प्रिंच देख रहे हैं कहानी शुरू होती है साल 1993 से उस समय भारत में कोईला खरानों का आवंट निलामी के जरिए नहीं होता था कंपनियां आवेदन करती थी और एक स्क्रीडिंग कमेटी उनकी योगिता और जरूरतों को देखकर सिफारिश करती थी फिर सरकार उन सिफारिशों के आधार पर कोईला ब्लॉक आवंटित करती थी करीब सत्रा साल तक यही व्यवस्था चलती रही इस दौरान सरकारी और निजी कंपनियों को कई कोहिला ब्लॉक दिए गए लेकिन बाद में इसी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे साल 2012 में सीएजी यानि कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट संसद में पेश हुई इस रिपोर्ट ने पूरे देश में राजनीतिक भोचाल दिया सीएजी ने कहा कि कई कोईला ब्लॉक बिना पारदर्शी निलामी प्रक्रिया के आवंटिट किए गए रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि अगर इन ब्लॉकों की निलामी की जाती तो सरकार को ज्यादा राजस्व मिल सकता था यही अनुमान करीब 1.86 लाख करोड़ रुपए के संभावित नुकसान के आंकले के रूप में सामने आता था कुछ चर्चा में रहता था आपको याद भी होगा हला कि बाद में कई इकॉनमिस्ट और एक्सपर्ट्स ने इस अनुमान की गिंती के तरीके पर सवाल भी उठाए विपक्ष ने सरकार को घेरा, मीडिया में लगातार बहस हुई और धीरे धीरे ये मुद्धा UPS सरकार की पहचान बन गया अब आते हैं उस खास मामले पर जिसमें मनमोहन सिंग का नाम आया ये मामला था उडिसा के तालाबीरा 2 कोईला ब्लॉक का साल 2005 में तालभीरादव बुलोग का आवंटन किया गया था अ इनडलों को इंडस्ट्रीज को भी इसमें मेरा मनमोहन सवाल उठाये गया कि क्या किसी दबाव या गलत तरीके से फैसला बदला गया लेकिन मनमोहन सिंग ने हमेशा कहा कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया उनका कहना था कि प्रधान मंतरी के तौर पर वो अलग-अलग कमंतरालियों और अधिकारियों के सलाह के अधार पर फैसले लेते हैं हर प्रशास्टिक फैसले को अपराद नहीं माना जा सकता मामला CBI तक पहुचा, जांच शुरू हुई, दस्तावेजों की जांच की गई, अधिकारियों से पूस्ताच हुई, सम्मंधित कमपनीयों और लोगों के बयान दर्श की गए CBI ने जांच के बाद पाया कि मनमोहन सिंग के खिलाफ आपराधिक साजिश या निजी फायदे का कोई ठोस सबूत नहीं है इसी आधार पर CBI ने साल 2014 में Closer Report दाखिल किया मतलब जांच एजेंसी ने अदालत से कहा कि उपलद सबूतों के अधार पर इस मामले में आगे मुकदमा चलाने का अधार नहीं मनता। लेकिन इसके बाद कहानी में बड़ा मोड आया। स्पेशल CBI कोर्टे CBI की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। मार्च 2015 में अदालत ने मनमोहन सिंग उद्योगपती कुमार मंगलम बिल्डा, पूर कोईला सचिव, पीसी पारक और अन लोगों को आरूपी की रूप में तलब कर लिया। ये एक एतिहासिक घटना थी। मनमोहन सिंग ने इस आदेश को सुप्रीम कोड में चुनौती दी, उनकी दलील थी कि उनके खिलाब कोई आपराधिक इरादा साबित नहीं होता, कोई देजी फायदा नहीं दिखता, और केवल सरकारी प्रक्रिया में लिया गया फैसला आपराध नहीं बन सकता. सुप्रीम कोर्ड ने उसी समय ट्रायल कोर्ड के आदेश पर रोक लगा दी इसके बाद मामला कई सालों तक चलता रहा फिर 26 दिसमबर 2024 को 92 साल की उम्र में मनमोहन जिंकार निधन हो गया लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी बाकी थी सुप्रीम कोर्ड ने फैसला सिर्फ इसलिए नहीं टाला कि आरोपी व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं है आदालत ने मामले की मेरिट पर सुनवाई की कोर्ड ने CBI की रिपोर्ट, दस्तवेजों और पूरे रिकॉर्ट को देखा और आखिरकार अदालत इस निस्कर्ष पर पहुँची कि ट्रायल कोड के पास CBI क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने का परियाप आधार नहीं था। की कमी थी कई मामलों में अलग-अलग लोगों के खिलाब जांच हुई और कारिवाई भी हुई इसलिए पूरे कोईला विवाद और मनमोहन सिंह से जुड़े ताला बीरा 2 मामले को एक जैसे समझना सही नहीं होगा इस फैसले के मतलब सिर्फ पर इतना है कि ताला वीरा 2 मामले में मनमोहन सिंह के खिलाव आपराधिक मुकदमा चराने लग पर्याप सबूत नहीं मिले लेकिन इस कहानी का एक पहलु आदालत के फैसले से भी आगे जाता है क्योंकि राजनीत में फैसले अक्सर बहुत अलदी सुना दिये जाते हैं आरोप लगते हैं धरणाय बनती है छवित तय होती है लेकिन कानून अपनी रफ्तार से चलता है और आखिर में सुबूतों के आधार पर अपना फैसला सुनाता है मनमोहन सिंह 2014 में कहा था कि इतिहास उनके साथ ज्यादा न्याय करेगा शायद वह उस वक्त यही उम्मित कर रहे थे कि आने वाले समय में उनके फैसलों और उनकी भूमिका को ज्यादा संतुलित नजर से देखा जाएगा सुप्रीम कोड का फैसला उनके पक्ष में आया है लेकिन इसे सुनने के लिए मनमोहन सिंग्ग खुद मौजूद नहीं थी। पर क्या सोचना है कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए का इसे लिखा था मारी साथ खुशबूर मेरा नाम सौरप तिरपाठी कैमरेक पेशान राघ है लेकर यह न्यूस पेंच शुक्रिया अ