
Summary
इन महिला खिलाडियों की असली कहानी, पदकों से कहीं आगे गाउंव की पगडंडियों और संघर्षों से जुड़ी है.
“जब लगन सची हो, तो गाव देहाथ के साधारन परिवारों से शुरू हुआ सफर भी दुनिया के शीर्ष पोडियम तक पहुँच सकता है.”From the report
अंतरराश्ट्रिय मंच पर तिरंगा लहराता है, तो पूरा देश गर्व महसूस करता है. लेकिन Commonwealth Games 2026 में भारत का नाम रोशन करने वाली इन महिला खिलाडियों की असली कहानी, पदकों से कहीं आगे गाउंव की पगडंडियों और संघर्षों से जुड़ी है. हरियाना के छितरोली गाउं की शर्मिला धांकर ने पोलियो, घरेलू हिंसा और गरीबी को हरा कर शौटपुट में स्वर्ण पदक जीता, जिनकी ट्रेनिंग के लिए परिवार ने अपनी जमीन तक बेच दी थी. इसी संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए मनीपुर की मीरा बाई चानू ने बांस के डंडो से अभ्यास किया और ट्रको से लिफ्ट लेकर ट्रेनिंग सेंटर पहुँचकर वेटलिफ्टिंग में भारत को एक और स्वर्ण दिलाया। सीमित साधनों से ही वेट लिफ्टिंग में रजत पदक हासिल किया। इसी कड़ी को पूरा करते हुए मनीपुर की बिंद्यारानी देवी ने दिन भर अपनी पारिवारिक किराने की दुकान संभालने के बाद देर रात तक अभ्यास किया और कान से पदक जीता। इन सभी वीरांगनाओं की सफलता यह साबित करती है कि जब लगन सची हो, तो गाव देहाथ के साधारन परिवारों से शुरू हुआ सफर भी दुनिया के शीर्ष पोडियम तक पहुँच सकता है.