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Summary
भारत की संसद ने तप्रिवेंशन आफ इंसल्ट्स टू नैशनल ओनर अमेंडमेंट बिल 2026 को पारित किया, जिसमें राष्ट्रगीत वंदे मातरम को भी शामिल किया गया है। यह कानून 1971 के मूल कानून में बदलाव करता है, जिसमें राष्ट्रगीत का कोई जिक्र नहीं था।
From the report
मौनसून सेशन 2026 में भारत की संसद ने एक एतिहासिक फैसला लिया है संसद के दोनों सदनों ने तप्रिवेंशन आफ इंसल्ट्स टू नैशनल ओनर अमेंडमेंट बिल 2026 को पारिट कर दिया है ये amendment उस कानून में किया गया है जो पिछले 55 सालों से देश के राष्ट्रिय प्रतीकों की गरिमा की रक्षा करता आया है अब तक केवल सम्विधान, राष्ट्रि ध्वज तिरंगे और राष्ट्र गान के अपमान को अपराद माना जाता था लेकिन अब इस कानून का स्कोब बढ़ाकर राष्ट्रगीत वंदे मातरम को भी इसमें शामल कर लिया गया है क्या अब वंदे मातरम का अपमान करना भी तिरंगे या राष्ट्रगान के अपमान जितना ही बड़ा अपराध माना जाएगा क्या अब इसे न गाने या खड़े न होने पर भी कारवाई होगी और इस कानून में आखिर क्या बदलाव किये गए हैं आज इस पूरी कहानी को समझने की कोशिश करेंगे नमस्कार मेरा नाम वरुन है और आप देख रहे हैं जिस्ट The Prevention of Insults to National Honor Amendment Bill 2026 को संसद के मौनसून सेशन के दोरान 24 जुलाई 2026 को राजसभा में पेश किया गया था सबसे पहले इस पर राजसभा में चर्चा हुई जहां इसे 29 जुलाई को पारित कर दिया गया इसके बाद 30 जुलाई 2026 को लोकसबाने भी इस बिल को मंजूरी दे दी संसद के दोनों सद्नों से पारित होने के बाद अब इस बिल को राश्टरपती के पास भेजा जा चुका है राश्टरपती की मनजूरी और गजजट नोटिफिकेशन प्रकाशित होने के बाद ये amendment आधिकारिक रूप से कानून बन जाएगा इसका मतलब ये कि राष्ट्रपती की मनजूरी मिलने के बाद वन्दे मातरम का जान बूचकर अपमान करना भी उसी तरह punishable offense होगा जैसे आज तक तिरंगे या राष्ट्रगान के अपमान को माना जाता था यानि अगर कोई व्यक्ति वंदे मातरम का अपमान करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कारवाई की जाएगी अब समझते हैं कि ये नया अमिंडवेंट 1971 के मूल कानून में आखिर क्या बदलाव करता है सबसे पहले पुराने कानून को समझना जरूरी है 1971 लेकिन इस पूरे कानून में राष्ट्रगीत वंदे मातरम का कोई भी जिक्र नहीं था, अलाकि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा पहले से ही प्राप्त है, लेकिन उसे इस कानून के तहत कानूनी सनरक्षन नहीं मिला था, जो तिरंगे और राश्टरगान को प्राप था साल 2026 का अमेंडमेंट इसी स्थिती को बदल देता है अब वन्दे मातरम को भी इसी कानून के दाइरे में शामिल किया जा रहा है यानि राश्ट्र गीत के अपमान से जुड़े मामलों में भी कानूनी प्रापधान लागू होंगे जो अब तक राश्ट ध्वज और राश्ट गान पर लागू होते थे लेकिन यहां एक और सवाल उठता है कि कानून में आखिर अपमान की डेफिनेशन क्या है कौन सी बात अपमान मानी जाएगी और कौन सी नहीं अमेंडमेंट के मुताबेक अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से वन्दे मारत्रम को गाय जाने में जान बूचकर बाधा डालता है या उसका सार्वजनिक अपमान करता है या गाते वक्त खड़ा नहीं होता है तो उसके खिलाफ कारवाई की जा सकती है हाला कि कुछ सवालों के जवाब अभी भी सपश्ट नहीं है जैसे क्या वन्दे मातरम ना गाना अपने आप में अपराद माना जाएगा क्या इसके अतिहासिक कॉंटेक्स पर क्रिटिकल कॉमेंट्स करना कानून का उलंगन होगा इन सवालों के जवाब कानून के लागू होने के बाद उसके इस्तिमाल और अदालतों के इंटरप्रेटिशन से और सपष्ट होंगे सजा की बात करें तो 1971 के मूल कानून में राष्ट ध्वज और राष्ट गान के अपमान पर तीन साल की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रापधान है इस अमेंडमेंट के बाद ये पीनल प्रोवेजन्स वंदे मातरम से जुड़े मामलों में भी लागू होंगे सरकार का कहना है कि वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं है बलकि भारत के Independence Movement का एक प्रतीक है आजादी की लड़ाई के दोरान ये भारत के लिए एक प्रेरना और राश्ट्र चेतिना का प्रतीक बन गया था ऐसे में अगर राष्टरगान जनगर्मन तो राष्टिगीत बंदे मात्रंपर को शक्कार का तरक है कि इसी कानून की असमानता को खत्म करने के लिए इस नियुक्त क्लास पर इतिहास पर नजर डाले उसकी रचना बंकिम चंड चटूपाध्याय ने 1882 में अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी। 1905 में बेंगॉल पार्टिशन के विरोध का ये सबसे बड़ा नारा बन चुका था। Constituent Assembly 24 1950 उस समय Constituent Assembly ने ये भी माना था कि वंदे मातरम के पहले दो वर्सेज यानि पहले दो पद राष्ट्रिय उपयोग के लिए सूटेबल हैं। इसके बाद के पदों में मौझूद धार्मिक references को देखते हुए पहले दो पदों को ही आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया। 1937 में वंदे मात्रम के महत्वपुन पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। सरकार का कहना है कि आजादी के अंदोलन में वंदे मातरम की अतिहासिक भूमिका को देखते वे उसे भी कानूनी सनरक्षन मिलना चाहिए जो अब तक राश्टरगान को प्राप्त था। अब समझते हैं कि इस Amendment Bill को लेकर संसद के भीतर क्या भैस हुई राजसभा में चर्चा के दोरान Minister of State for Home Affairs नित्यानंदराय ने सरकार के पक्ष रखते वे कहा कि इस Bill का मकसद किसी पर नई बादिता थोपना नहीं बलकि देश के सम्मान और संस्कृतिक विरासत की रक्षा करना है उनके मताबिक वन्दे मातरम भारत के इंडिपेंडेंस मुवमेंट और राष्ट्रिय चेतिना का अमर प्रतीक है इसलिए उसे भी वही कानूनी संरक्षन मिलना चाहिए जो दूसरे राश्ट्रिय प्रतीकों को प्राप्त है वही विपक्ष ने इस बिल के कई पहलूँओं पर सवाल उठाए सबसे बड़ा सवाल आर्टिकल 19-1A यानी Freedom of Expression को लेकर था विपक्ष का कहना था कि कानून में इंसल्ट जैसे शब्द का मतलब पूरी तरह साफ नहीं है आखिर ये कैसे तै होगा कि किसी ने सच में अपमान किया है या नहीं उनका तरफ था कि अगर इसकी सीमाएं सपश्ट नहीं होंगी तो भविश्य में इसके मिस्यूज की आशंका पैदा हो सकती है उसका मिस्यूज न हो और नागरिकों के कॉंस्टिटूशनल राइट्स भी सुरक्षित रहे हैं। संसद ने इस अमेंडमेंट बिल को मनजूरी दे दी हैं। लेकिन इसके बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। पहला सावाल यही है कि क्या ये कानून अब वंदे मातरम गाना हर नागरिक के लिए मैंडिटरी बना देता है? टेक्निकली इसका जवाब नहीं है. इस अमेंडमेंट में ये कहीं भी नहीं कहा गया कि हर वेक्ती के लिए वंदे मातरम गाना मैंडिटरी होगा. कानून मुखे रूप से उसके अपमान उसके गाय जाने में जानबूचकर बाधा डालने को अपराध की कैटिगरी में लाता है अब अगर किसी पब्लिक प्रोग्राम में कोई व्यक्ति वंदे मात्रम नहीं गाता है और कोई उसके खिलाफ कम्प्लेंट दर्ज कर देता है तो क्या होगा? क्या सिर्फ चुप रहना अपमान माना जाएगा? इन सवालों के जवाब अभी स्पश्ट नहीं है. इस confusion को दूर करने के लिए आने वाले समय में इसका जिक्र अदालतों को करना पड़ सकता है दूसरा सवाल इस कानून के implementation को लेकर है 1971 का मूल कानून भी आज तक मौजूद है लेकिन उसके तहट बहुत कम cases दर्ज हुए हैं अब बंदे मातरम भी इसी कानून का हिस्सा बन जाएगा। ऐसे में ये देखना जरूरी होगा कि पुलिस और जाच एजिन्सियां इस कानून का इस्तिमाल किन परिस्थितियों में करती हैं। एक्सपर्ट्स का एक वर्ग ये भी मानता है कि ऐसे कानूनों को लागू करते समय बेहत सापधानी की जरूरत होती है। क्योंकि अगर किसी कानून की डेफिनेशन बहुत ब्रॉड हो तो अलग-अलग मामलों में उसका अर्थ भी अलग-अलग निकाला जा सकता है। वही सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्च सिर्फ राष्ट्रिय सम्मान की रक्षा करना है और इसका इस्तिमाल कानून के दाईरे में ही होगा। भारत जैसे डेमोक्रेसी में राष्ट्रिय प्रतीकों का सम्मान नी संदेह जरूरी है लेकिन उतना ही जरूरी ये भी है कि कानून की भाषा स्पश्ट हो उसके इंप्लिमेंटेशन का तरीका निस्पक्ष हो और नागरिकों के अधिकार और कानूनी प्रोसेस के प्रभावों के बीच संतुलन बना रहे आने वाले समय में ये इस बदलाव की सफलता सिर्फ इस बात से तै नहीं होगी कि कितने केसेस दर्ज हुए बलकि इससे भी तै होगी कि क्या ये बदलाव बिना किसी विवाद के राष्टे सम्मान को मजबूत कर पाया अब आप इस बदलाव के बारे में क्या सोचते हैं अपनी राय कॉमेंट्स में जरूर बताएं देश और दुनिया की बड़ी खबरों के लिए देखते रहें जिस्ट शुक्रिया